इंसान के दिमाग में घुसेगा कम्प्यूटर का कीड़ा, सारी दुनिया को पता चल जाएंगे आपके सीक्रेट और प्लान

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कई बार ऐसा होता होगा कि आप कुछ सोचते हैं, लेकिन उसे करने से पहले ही भूल जाते हैं. कोई बेहद महत्वपूर्ण काम या कोई पासवर्ड अचानक दिमाग से गायब हो गया, फिर उसे याद करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में आपको वो सारी हॉलीवुड (Science Fiction Reality) फिल्में याद आ जाती हैं, जिनमें ब्रेन से कनेक्टेड टेक्नॉलजी दिखाई जाती है. ये सिर्फ फिल्में नहीं, हमारी ज़िंदगी का बेहद नज़दीकी सच है. कुछ ही सालों में हमारी लाइफस्टाइल ऐसी ही रोबोटिक टेक्नॉलजी से लैस होगी.

ये नई तकनीक विकसित कर रहे हैं टेक टायकून एलन मस्क (Elon Musk) . उनकी कंपनी ने इसका डेमो भी दे दिया है. इस तकनीक के ज़रिये हमारा दिमाग किसी दूसरी मशीन के साथ सीधा कनेक्टेड (Neuralink Technology and Human Brain) होगा. इसका फायदा ये है कि हमारे दिमाग में कोई बात आते ही प्रॉसेस होने लगेगी. एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक (Neuralink) एक ऐसा ही न्यूरल इम्प्लांट विकसित कर रही है, जो बिना किसी हार्डवेयर के इंसानी दिमाग की गतिविधियों को दूसरी मशीन पर प्रसारित कर देगी.

क्या है न्यूरालिंक टेक्नोलॉजी?

ये तकनीक ऐसे न्यूरल इंप्लांट (Neuralink Technology) को विकसित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है, जिससे इंसानी दिमाग को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) से सिंक्रोनाइज़ करके कम्प्यूटर्स, कृत्रिम शारीरिक अंग और दूसरी मशीनों को सिर्फ सोचने भर से चलाया जा सके. इसके लिए विकसित की जा रही डिवाइस बेहद छोटी होगी. इसका आकार नाखून के बराबर होगा और ये बैटरी से ऑपरेट होगी. इसमें इस्तेमाल होने वाले तार इंसान के बालों से भी कई गुना पतले होंगे. इसे दिमाग के अंदर इंप्लांट किया जाएगा.

एलन मस्क ने इस टेक्नॉलजी की घोषणा पिछले साल ही कर दी थी.

कुछ लोगों के लिए वरदान होगी तकनीक

अगर ये तकनीक अच्छी तरह विकसित हो गई, तो इससे फायदा उन लोगों को होगा, जिनके हाथ-पांव नहीं चलते लेकिन दिमाग चलता है. रीढ़ की हड्डी की चोट, स्ट्रोक या फिर और भी शारीरिक अक्षमताओं के चलते काम न कर पाने वाले लोगों के लिए ये तकनीक वरदान होगी. न्यूरालिंक के ज़रिये वे अपने दिमाग का इस्तेमाल कर पाएंगे. हालांकि खुफिया एजेंसियों और एजेंट्स के लिए इसकी उपयोगिता सबसे ज्यादा होगी.

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कोई सीक्रेट छिप नहीं पाएगा

इस तकनीक से कम्प्यूटर सुपरमेसी का डर सबसे ज्यादा है. दिमाग विचारों से मशीनों पर काबू पाएगा लेकिन अगर इसका उल्टा हुआ तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इंसानी दिमाग पर काबू पा सकती है. ऐसा हुआ तो न तो कोई सीक्रेट आप तक सीमित रहेगा न ही कोई प्राइवेसी बाकी रहेगी. वहीं दिमाग के अंदर बाहरी चीज़ फिक्स करने से इंफेक्शन का भी खतरा बना रहेगा और ब्रेन न्यूरॉन्स के लिए खतरा बन सकता है.

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