वो शख्स, जिसे एक्सपेरिमेंट के नाम पर मिली थी दुनिया की सबसे दर्दनाक मौत, 83 दिन तक गल-गलकर गिरी थी चमड़ी

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अक्सर देखा जाता है कि किसी की अचानक मौत हो गई या लंबे समय से बीमार रहने की वजह से कोई मर गया. आज हम बात करेंगे ऐसी मौत की जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा. ऐसी दर्दनाक मौत जिसके बारे में जानकर किसी के भी शरीर में सिरहन पैदा हो सकती है.
यह कहानी जापान (Japan) के रहने वाले और टोकाईमुरा न्यूक्लियर पावर प्लांट (Tokaimura Nuclear Power Plant) में काम कर रहे 35 वर्षीय हिसाशी ओची (Hisashi Ouchi) की है. जिसके साथ 28 सितंबर 1999 में एक भयानक हादसा हुआ और उसके बाद जो हुआ उसकी किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. इसके बाद आने वाले 83 दिन उसके लिए कैसे जहन्नुम (Hell) से भी बदतर हो गए, यह हम आपको बताएंगे.

28 सितंबर का मनहूस दिन

दरअसल, 28 सितंबर 1999 की सुबह हिसाशी अपने कुछ साथियों के साथ रोज की तरह प्लांट की लैब में काम कर रहे था. उस दौरान न्यूक्लियर टेक्निशियन (Nuclear technician) हिसाशी एक बड़े टैंक में रेडियोएक्टिव यूरेनियम (Radioactive Uranium) डालने में अपने सहकर्मी मसाटो शिनोहारा की मदद करने लगा. उस वक़्त वो इस बात से बिल्कुल बेख़बर था कि अगले ही पल उसकी जिंदगी उसके लिए सज़ा बनने वाली है.

कुछ ही सेकेंड में पूरा कमरा नीली रौशनी (Blue Flash) से भर गया. दरअसल, टैंक में पहले से मौजूद धातु और यूरेनियम (Uranium) के मिश्रण ने रिएक्शन करना शुरू कर दिया. जिसके बाद वह एक ‘क्रिटिकल पॉइंट’ (Critical Point) पर आगया, साथ ही उसमें से न्यूट्रॉन रेडिएशन (Neutron Radiation) और गामा रेज़ (Gamma Rays) निकलने लगीं. इस हादसे में हिसाशी पर सबसे बुरा असर पड़ा.

जिस दौरान यह हादसा हुआ, उस समय हिसाशी से 4 मीटर दूर एक और सहकर्मी युताका योकोकावा भी मौजूद था. हादस में ओची के साथ मौजूद बाकि दोनों टेक्नीशियन की मौत हो गई थी लेकिन ओची की किस्मत को कुछ ही और मंजूर था.
इतने बड़े हादसे का जिम्मेदार कौन?

जानकारी के मुताबिक वहां मौजूद किसी भी शख्स को ऐसी संवेदनशील प्रक्रियाओं (Sensitive procedure) को करने की ट्रेनिंग नहीं दी गई थी. जांच में यह निकल कर आया कि मिश्रण (Mixture) में 16 किलो यूरेनियम डाला गया था जबकि उसे डालने की लिमिट 2.4 किलो तय की गई थी.
हादसे के बाद हिसाशी का क्या हुआ?

विस्फोट के तुरंत बाद हिसाशी बार-बार बेहोश होने लगा, उल्टियां (Vomiting) करने लगा. साथ ही उसका शरीर भी झुलस (Burns) रहा था. जानकारी के मुताबिक उसके शरीर ने उस जहरीली रेडिएशन के 17 सिवर्ट (Sieverts) सोख लिए थे, जो कि माना जाता है किसी भी जीवित इंसान को मारने के लिए के लिए सबसे ज्यादा मात्रा है. गौरतलब है कि 8 सिवर्ट किसी की भी जान ले सकता है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हिरोशिमा और नागासाकी में हुए न्यूक्लियर हादसे के दौरान पीड़ित 0.5sv के संपर्क में आये थे. लेकिन हिसाशी के केस में इतनी ज्यादा रेडिशन के संपर्क में आने के बाद भी उसकी मौत तुरंत नहीं हुई.

ओची की हालात देख डॉक्टर्स के रोंगटे खड़े हो गए

हादसे के बाद उसे यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो हॉस्पिटल (University of Tokyo Hospital) ले जाया गया. डॉक्टरों के मुताबिक उन्होंने हिसाशी को जिस हालात में देखा वो किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती थी. बिना त्वचा का आदमी, लगभग शून्य सफेद रक्त कोशिकाएं (White Blood Cells), मल्टीपल ऑर्गन फेलियर (Multiple Organ Failure) और बर्बाद हो चुका इम्यून सिस्टम (Immune System). डॉक्टरों ने उसका इलाज करना शुरू किया और उसे स्पेशल रेडिएशन वार्ड (Special Radiation Ward) में रखा गया.

आगे उसकी हालत जान कर आप विचलित हो सकते हैं. दरअसल, बताया जाता है कि उसके शरीर से रोज 20 लीटर तरल (Fluid) लीक हो जाता था. उसकी आंखों से खून आने लगता था. जिसे उसकी पत्नी ‘खून के आंसू’ कहती थी.

रेडिएशन ने उसके डीएनए (DNA) का भी नामोनिशान मिटा दिया था. इसलिए डॉक्टरों ने उसके शरीर में उसकी बहन के डोनेट किये हुए स्टेम सेल्स (Stem cells) लगाए, इस उम्मीद में कि शायद उसका शरीर इससे मजबूत होगा और वह जल्दी ठीक हो जाएगा.
हिसाशी को कैसा महसूस होता था?

यह शायद किसी के लिए सोच पाना भी मुश्किल होगा कि उसे कितना दर्द महसूस होता होगा और वह कितना तड़पता होगा. लेकिन जानकारी के मुताबिक कई बार वो चीख-चीख कर दया की भीख मांगता था. बताया जाता है कि 7वें दिन उसने चिल्ला कर कहा ‘मैं यह सब और बर्दाश्त नहीं कर सकता, मैं गिनी पिग (Guinea Pig) नहीं हूं’

और वो जिंदगी की जंग हार गया…

रिपोर्ट के मुताबिक 59वें दिन 49 मिनट में 3 बार उसके दिल ने धड़कना बंद किया लेकिन हर बार उसके परिवारवालों के गुहार लगाने के बाद उसे बचाने की कोशिश की गई. वह उसे हर हाल में जीवित चाहते थे. लेकिन हफ्तों तक ब्रेन डेड (Brain dead) रहने, लाइफ सपोर्ट मशीन (Life support machine) पर रहने के बाद उसके शरीर ने जवाब दे दिया. यह तारीख थी 21 दिसंबर 1999 जब ओची को उसके दर्द से आखिरकार मुक्ति मिल गयी थी.

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