‘हामिद’ से पता चलता है कि कश्मीर में बच्चे पत्थरबाज़ भी बनते हैं और कारीगर भी

Share Now To Friends!!

Hamid Movie Review: इस फिल्म के बारे में पढ़ने से पहले जान लीजिए कि ये एक आम बॉलीवुड फिल्म नहीं है. हां, कश्मीर के मुद्दों पर बनी ये एक आम फिल्म है जो सरसरी तौर पर अलगाववाद, गायब हो जाते लोग, सेना के घाटी में दबाव, घाटी के रहनेवालों की स्थिति, पाकिस्तान और आतंकवादी संगठनो की घाटी में सक्रियता और पत्थरबाज़ी के विषयों को छूकर निकलती है.

इस फिल्म में इतने गंभीर मुद्दे हैं कि एक 7 साल के कश्मीरी बच्चे और एक फौजी के बीच की संवेदनशील कहानी आपको डार्क लगने लगती है. निर्देशक एजाज़ ख़ान की इस फिल्म में इतना दर्द है कि एक समय पर जाकर आप थिएटर से निकल जाना चाहते हैं और यही कुलबुलाहट निर्देशक आपके मन में जगाना भी चाहते थे. वो आपको बताना चाहते हैं कि उपर से कश्मीर का मुद्दा जितना सरल दिखता है वो ज़मीन पर उससे कहीं ज्यादा मुश्किल और उलझा हुआ है.

कभी लोग देते थे गालियां, आज इस पहलवान के रिटायरमेंट पर रो रहा है सोशल मीडिया

7 साल के बच्चे हामिद (ताल्हा अरशद रेहशी) के पिता रहमत (सुमित कौल) एक रात घर से निकलते हैं तो वो वापस घर नहीं लौटते. सालभर अपने पति को खोजती इशरत (रसिका दुग्गल) अपना सब कुछ भूल चुकी है. यहां तक की अपने बेटे हामिद की भी वो सुधबुध नहीं लेती. हामिद को पता चलता है कि उसके पिता अल्लाह के पास हैं. अपने पिता को वापस बुलाने के लिए उसे कई तरह के रास्ते बताए जाते हैं.जहां एक शख्स उसे जिहाद और पत्थरबाज़ी का रास्ता सिखाता है तो दूसरा शख्स उसे अपने पिता का काम सिखाने की बात कहता है. लेकिन अपने पिता को अल्लाह के पास से वापस लाने के लिए हामिद एक आसान रास्ता चुनता है. वो अल्लाह को फोन मिलाता है और फोन मिल जाता है एक CRPF के जवान को. इसके बाद की कहानी यहां लिखना फिल्म के साथ नाइंसाफी होगी लेकिन इतना बता सकते हैं कि फिल्म आपको आश्चर्यचकित नहीं करेगी.

अगर आपको कश्मीर के हालातों की थोड़ी भी जानकारी और आप खबरें पढ़ते हैं तो ये फिल्म आपको खबरों का एक वीडियो वर्जन जैसी लग सकती है. गंभीर मुद्दों पर बनी ये फिल्म इतनी गंभीर हो जाती है कि आप उकता सकते हैं. फिल्म को एडिट कर बहुत छोटा किया जा सकता था लेकिन कश्मीरी लोगों का दर्द दिखाने के फेर में एजाज़ ने फिल्म को बहुत लंबा खींच दिया है. फिल्म किसी भी चीज़ के तह में नहीं जाती – न किरदारों के, न मुद्दों के, न कश्मीर के – ये फिल्म कुछ और लंबी कर एक डॉक्यूमेंट्री की तरह बनाई जाती तो और बेहतरीन बन सकती थी.

फिल्म में जब जब सिपाही अभय और बच्चे हामिद के बीच सवांद आता है तो फिल्म में एक तेज़ी और ताज़गी आती है. इन दो लीड किरदारों के बीच के सवांद में ही कहानी सबसे तेज़ भागती है. लेकिन इन किरदारों के बाहर की दुनिया को ठीक से निर्देशक नहीं दिखा पाते हैं.

हामिद के कुछ दृश्य बेहद संवेदनशील हैं. सेना के जवानों का एक आम कश्मीरी को रोकना, एक पिता का मजबूरी में बाहर जाना, अलगाववादियों का बचपन से ही कश्मीरी बच्चों पर निगाह रखना, मां का अपने बेटे से पैसे मांगना. छोटे छोटे दृश्यों में ये फिल्म आपको छू लेती है लेकिन बार बार फिल्म की धीमी गति इसकी पकड़ आप पर बनने नहीं देती.

फिल्म में रसिका दुग्गल ने अपने पति को ढूंढती महिला का किरदार बेहद सक्षम तरीके से निभाया है और छोटी सी भूमिका में समित कौल भी अपनी छाप छोड़ते हैं. महीनों से छुट्टी के लिए परेशान एक फौजी के किरदार में विकास कुमार भी जमते हैं और लीड रोल में ताल्हा ने जबर्दस्त काम किया है. वो एक छोटे बच्चे की सरलता अपने अंदर समेटे हुए हैं और निर्देशक ने भी उनसे बेहतरीन काम करवाया है. हिंदी भाषी लोगों को वो कमज़ोर लग सकते हैं लेकिन एक कश्मीरी बच्चे की सवांद अदायगी वैसी ही होती है, जैसी वो फिल्म में है.

फिल्म संतुलित है और प्रशासन और कश्मीर के निवासियों की समस्या को संतुलित तरीके से दिखाती है. इस फिल्म में कई ऐसे सवांद है जो आपको सोचने के लिए मजबूर करते हैं. फिल्म में पत्थरबाज़ी और अलगाववाद की तरफ बच्चों का रुझान कैसे हो सकता है इस बात को बहुत सावधानी और बारीकी से दिखाने में निर्देशक सफल हुए हैं. फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है लेकिन बार बार फिल्म की गति परेशान करती है. अगर आप कश्मीर के मुद्दों में दिलचस्पी रखते हैं तो इस फिल्म को देखें वर्ना पूरे परिवार के साथ देखने जाए, हामिद वो फिल्म नहीं है.

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी WhatsApp अपडेट्स

Source link


Share Now To Friends!!

Leave a Comment