28 साल पहले क्यों हुई थी ‘कमला की मौत’?

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एक लड़की है कमला. कमला परेशान है. कुछ ऐसा है जो वो किसी से बांटना तो चाहती है लेकिन नहीं बांट पा रही है. वो शायद सोच रही है कि उसने जो किया उससे उनकी परिवार की बदनामी होगी.

कमला अपने घर की बालकनी से कूदकर आत्महत्या कर लेती है. लेकिन कमला की मौत तो सिर्फ एक शुरुआत है. इस मौत के बाद और शायद इसकी वजह से परत-दर-परत समाज के दोगलेपन का नकाब उतर जाता है. कमला ने खुदखुशी इसलिए की थी क्योंकि वो प्रेग्नेंट थी, शादी से पहले.

लेखक और निर्देशक बासु चैटर्जी की फिल्म ‘कमला की मौत’ साल 1989 में रिलीज हुई थी. यह फिल्म प्यार, सेक्स, प्री-मेरिटल प्रेग्नेंसी और ‘सभ्य समाज’ की हकीकत पर एक कसी हुई कहानी सुनाती है.

पड़ोस में रहने वाली कमला की मौत के बाद पड़ोस में रहने वाली दो बहनों गीता और चारु का परिवार बहुत दुखी है. उनके माता-पिता को यह भी चिंता है कि कहीं उनकी बेटियां भी कमला की तरह कोई गलत कदम ना उठा लें.जैसे-जैसे रात गहराती है, गीता, चारु, उनकी मां और पिता अपने-अपने असली किरदारों में उतर जाते हैं.

गीता यानी रूपा गांगुली अजीत नाम के एक लड़के से प्यार करती है. अजीत के रूप में इरफान खान बार-बार गीता को अपने कमरे पर आने का अनुरोध करता है. कमला की मौत के बाद अपने बिस्तर पर पड़ी गीता यह सोच कर सहम उठती है कि कहीं उसके साथ ऐसा हुआ होता, वो प्रेग्नेंट हो गई होती तो वो क्या करती!

इरफान और रूपा गांगुली

गेट के बगल में लेटी उसकी छोटी बहन चारु यानी मृणाल कुलकर्णी अभी जवानी की दहलीज पर कदम रख ही रही है. अपने कॉलेज में पढ़ने वाले दीपक के लिए चारु के मन में बहुत सारी भावनाएं पैदा हो गई हैं. दोस्तों के साथ पिकनिक पर अकेले होने पर दीपक और चारु काफी करीब आ गए थे. अब अपनी बहन की कशमकश से बेखबर चारु भी यह सोचकर पसीने से तर हो गई है कि कहीं उस दिन वह खुद को ना रोकती तो क्या उसे भी कमला की तरह जान देनी पड़ती!

दूसरे कमरे में गीता और चारु के माता पिता सोए हैं. जहां दोनों लड़कियां अपने आज को लेकर घबरा रही हैं, उनके माता-पिता के सामने उनका बीता हुआ कल मुंह बाए खड़ा हो गया है.

मां यानी आशा लता को उनका बचपन परेशान कर रहा है. कच्ची उम्र में वो अपने ट्यूशन टीचर के प्यार में पागल हो गई थी. शादीशुदा मास्टर को वो दिनभर प्रेम भरी चिट्ठियां लिखती थी. लेकिन जब मास्टर ने उसका प्रणय-निवेदन ठुकरा दिया, उसने भी खुदखुशी की थी. इसी बीच घर वालों ने तय किया कि अब इसकी पढाई छुड़वाकर शादी कर दी जाए.

वहीं दूसरे बिस्तर पर लेते पिताजी यानी पंकज कपूर को अपनी जवानी के दिन किसी बुरे सपने की तरह याद आ रहे हैं. अपनी जवानी के दिनों में उन्होंने बहुत से अफेयर चलाए थे. एक लड़की से उनका प्यार ऐसा परवान चढ़ा कि वो लड़की प्रेग्नेंट हो गई. इसके बाद उन्होंने अपने एक दोस्त की पत्नी से भी संबंध बनाए. दोस्तों ने उनसे कन्नी काट ली. परिवार ने उन्हें शादी करके सेटल हो जाने को कहा.

इसके लिए चुनी गई वो नाबालिक लड़की जो अपने मास्टर के प्यार में पड़कर पढ़ाई से दूर हो गई थी.

इस तरह जैसे-जैसे रात आगे बढ़ती है, एक आदर्श परिवार का नकाब पूरी तरह से उतर जाता है. फिल्म में यह बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है कि सेक्स को लेकर हमारी कुंठा, ज्ञान की कमी और समाज में बदनामी का डर अक्सर लड़कियों को खुदखुशी जैसा कदम उठाने पर मजबूर कर देता है.

1989 में बनी यह फिल्म अपने समय से काफी आगे की थी. आज भले ही समाज बहुत आगे बढ़ चुका है, लेकिन सेक्स का जिक्र आते ही आज ही खुसुर-फुसुर ही शुरू हो जाती है.

आज भी हमारे समाज में शादी से पहले प्रेग्नेंट हो जाने वाली लड़कियों को परिवार पर कलंक जैसी उपाधियों से नवाजा जाता है. लेकिन सुरक्षित तरीकों की कमी और ज्ञान का अभाव इसका कारण है ये कोई नहीं समझता.

80 के दशक में इस तरह की बहस छेड़ने वाली यह फिल्म समय से आगे की तो थी ही, समय को आगे बढ़ाने वाली भी थी. इस फिल्म के लिए बासु चैटर्जी को 36वें फिल्मफेयर अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले का अवार्ड मिला था.

फिल्म में शुरूआती दौर के इरफान खान और आशुतोष गोवारीकर को देखना अच्छा अनुभव है. साथ ही ‘सोनपरी’ मृणाल कुलकर्णी का बचपन भी इस फिल्म में आकर्षित करता है.

यह फिल्म इन दिनों अमेजन प्राइम वीडियोज पर बहुत प्रमोट की जा रही है. कारण यह कि अमेजन के पास इस फिल्म के राइट्स हैं. यह एक अच्छा प्रयास है लीक से हटकर बनीं फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने का. अगर आप इंडी और अर्थपूर्ण सिनेमा के प्रेमी हैं तो यह फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिए. हालांकि तकनीक और एक्टिंग के मामले में यह जरूर ध्यान में रहे कि यह फिल्म आज से 28 साल पुरानी है.

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