FILM REVIEW: ‘ट्यूबलाइट’ यानी इमोशन, इमोशन और सिर्फ इमोशन..!

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‘ट्यूबलाइट’. सलमान खान और सोहेल खान के ‘भाईचारे’ की कहानी. उत्तर भारत में ‘ट्यूबलाइट’ उस शख्स को कहते हैं जो हर बात देर में समझता है, वैसे ही जैसे ट्यूबलाइट ‘पक-पक’ करके जलती थी. आज के एलईडी वाले जमाने के लोग ये बात कम ही जानते होंगे. लेकिन फिल्म में ‘ट्यूबलाइट’ के दोनों मतलब को बहुत विस्तार से समझाया गया है.

फिल्म के ट्रेलर में यह बात साफ कर दी गई थी कि इसकी कहानी एक अमेरिकी-मैक्सिकन फिल्म ‘लिटिल बॉय’ से ऑफिशियली ली गई है.

अगर अंग्रेजी वाली वो फिल्म आपने नहीं देखी है और कबीर खान ने ना बताया होता तो आपको पता भी नहीं चलेगा कि यह किसी का रीमेक है.

इस फिल्म में बहुत सारे इमोशन्स हैं, बॉलीवुड में कम ही देखा गया भाई-भाई का ‘ब्रोमांस’ है, शाहरुख खान हैं, बहुत सारा यकीन है और युद्ध में अपनों को खो देने का बहुत सारा गम है. लेकिन इसके बावजूद सलमान खान और उनके बाकी सह-कलाकार कोई खास प्रभाव छोड़ पाने में सफल नहीं हो पाए.कहानी: 2 स्टार

‘ट्यूबलाइट’ यानी कहानी जगतपुर, कुमाऊं में रहने वाले लक्ष्मण और भरत की. ‘कप्तान’ और ‘पार्टनर’ की. लक्ष्मण बड़ा भाई है. बहुत भोला है और हर बात थोड़ी देर में समझता है. ‘उसका साबुन स्लो है.’ स्कूल और मोहल्ले के बच्चे उसे ‘ट्यूबलाइट’ कहते हैं. छोटा भाई भरत स्कूल के लड़कों को पीट देता है.

फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है. जब भाई ‘भरत’ देश की सेवा के लिए सीमा पर चला गया है, लक्षमण उसके बिना बिल्कुल अकेला हो गया है. दोनों भाइयों का आपसी प्यार और एक-दूसरे पर निर्भरता फ़िल्म के शुरूआती 15 मिनटों में स्थापित कर दिए गए हैं.

गांव में बार-बार युद्ध से शहीदों की लाशों का आना और लक्ष्मण का अपने भाई को एक झलक देख लेने की उम्मीद रखना बहुत इमोशनल पहलू है.

फिल्म में चीनी एक्ट्रेस झू-झू एक प्रवासी चीनी के किरदार में हैं जिनकी तीन पुश्तें भारत में ही रह रही हैं. वो और उनके बेटे के किरदार में माटिन हिन्दुस्तान-चीन के युद्ध के बीच अपनी जड़ें और अपना अस्तित्व बचाते बेहतरीन लगे हैं.

चूंकि फिल्म 60 के दशक पर आधारित है, इसमें सत्य, अहिंसा और यकीन की ताकत समझाने के लिए गांधी जी का सहारा लिया गया है.

अपने भाई, अपने एकमात्र आधार और अपने सबसे अच्छे दोस्त को खो देने का गम लक्ष्मण को खा जाता है. हर कोई उसे छोड़ कर जा रहा है. लेकिन अंत में वही होता है जिसके लिए हम सुबह सवेरे उठकर फिल्म देखने जाते हैं. हैप्पी एंडिंग!

एक्टिंग: 3 स्टार

पूरी फिल्म सलमान खान के इर्द-गिर्द घूमती है. लेकिन स्क्रीन पर आंखें ठहरती हैं ओम पुरी और मोहम्मद जीशान अयूब की एक्टिंग पर.

आश्रम के बनने चाचा यानी ओम पुरी की एक्टिंग के बारे में क्या लिखा जाए जो अभी तक नहीं लिखा गया हो. बस उनका सौम्य और प्यार भरा किरदार बहुत सुकून देता है.

एक भड़का हुआ नौजवान जिसकी रगों में देश के लिए लड़ने का जज्बा दौड़ रहा है लेकिन जो दिमाग से सोचे बिना किसी को भी नुक्सान पहुंचा सकता है, ऐसे किरदार में जीशान बहुत फिट लगे हैं.

झू-झू को जितनी एक्टिंग दी गई उन्होंने निभाई है. लेकिन उनकी एक्टिंग से ज्यादा उनकी क्यूटनेस को प्रमोट किया गया है.

बात जहां क्यूटनेस की है तो माटिन रे टंगू ‘गूओ’ के किरदार में बहुत प्यारा लगा है. लेकिन प्रमोशन के दौरान अगर आपने उसके वीडियो देख लिए हैं तो फिल्म में आपको उसे छोटे से किरदार में देखकर निराशा होगी.

फिल्म में बोनस पॉइंट की तरह प्रमोट किया गया था किंग खान को. वो आते हैं तो जादूगर बनकर और लक्ष्मण को जादू देकर जाते हैं. यकीन का जादू. शाहरुख़ जादूगर के गेटअप में बहुत तिलिस्मी लगे हैं.

‘ट्यूबलाइट’ के किरदार में सलमान शायद और मासूम लग सकते थे. उनकी डायलॉग डिलीवरी कहीं-कहीं रटी-रटाई स्क्रिप्ट जैसी लगती है.

फिर हैं सोहेल खान. लेकिन वो क्यों हैं, ये समझना मुश्किल है. सोहेल की एक्टिंग से लगता है वो कोई नवोदित कलाकार हैं. सही मायनों में सलमान से ज्यादा ‘ट्यूबलाइट’ सोहेल खान लगे हैं.

सिनेमेटोग्राफी: 3.5 स्टार

विजुअल्स की नजर से फिल्म बहुत खूबसूरत है. प्रकृति के बहुत करीब यह फिल्म कुछ बहुत बेहतरीन नजारे दिखाती है. चूंकि हर तरफ पहाड़ियां, बर्फ, रेत, झरने और नदियां हैं, फिल्म का फ्रेम बहुत बड़ा है. रंग खूबसूरत हैं. पहाड़ी जीवन को फिल्म में करीबी से दिखाया गया है.

एक सीन जहां लक्ष्मण और गुओ सभी पुराने झूठों के लिए माफी मांगते हैं, उस सीन की एडिटिंग शानदार है.

युद्ध और मिलिट्री के सीन भी अच्छे हैं.

म्यूजिक: 3 स्टार

‘ट्यूबलाइट’ के गाने तो इस फिल्म की रिलीज से पहले ही सुपरहिट हो चुके हैं. कुछ गाने तो कहानी को आगे बढ़ाते हैं लेकिन ‘रेडियो’ बेवजह फिट किया हुआ सा लगता है.
बैकग्राउंड मुजिक की अधिकता है. युद्ध के कुछ दृश्यों में अगर एक दुखभरी म्यूजिक की जगह सन्नाटा होता तो उन सीन्स का प्रभाव शायद ज्यादा गहरा पड़ता.

कुल मिलाकर: 2.5 स्टार

कुल मिलाकर इस कहानी में इमोशन्स का ओवर डोज है. इमोशन फिल्म को आगे खींच सकते हैं लेकिन पूरी फिल्म को सिर्फ इमोशन्स पर आधारित करना दर्शकों के पॉपकॉर्न और कोल्डड्रिंक के पैसों के साथ नाइंसाफी है.

कबीर खान की इस फिल्म में बहुत सारी मॉरल साइंस की सीखें है, जिन्हें 5वीं क्लास में पढ़कर हम कभी-कभी भूल जाते हैं. लेकिन उन सीखों के लिए पैसे दे कर फिल्म देखना कितना जरूरी है ये तो फैंस को ही तय करना है.

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