FILM REVIEW: थोड़ी कड़वाहट भी ज़रूरी है

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फ़िल्म खत्म हो जाने के बाद फिल्म की पूरी कास्ट हमारे सामने आकर खड़ी हो गई, हमसे कहा गया कि अगर आप सवाल पूछना चाहें तो पूछ सकते हैं. लेकिन किसी के पास सवाल नहीं था, हाॅल में एक अजीब सी खामोशी थी, वहां एक गंभीरता थी, जिन लोगों ने फ़िल्म देखी उन्होंने उस एयर कंडीशन्ड सिनेमा हाॅल में भी उस “कड़वी हवा” को महसूस कर लिया था जो नीला माधव पंडा अपनी फ़िल्म में दिखाना चाह रहे थे.

कहानी

फ़िल्म की कहानी एक ऐसे सूखाग्रस्त इलाके की है जहां के किसान बारिश के अभाव में चौपट हो चुकी खेती और फिर बैंक लोन के दबाव में आत्महत्या कर रहे हैं.

एक अंधा पिता (संजय मिश्रा) अपने बेटे मुकुंद को कर्ज के जाल से निकालना चाहता है. वो इसके लिए बैंक के वसूली अधिकारी (रणवीर शौरी) से एक अनोखी डील भी कर लेता है. लेकिन क्या अपने बेटे को वो इस जाल से निकाल पाएगा, या गाँव में चल रही कड़वी हवा उसके बेटे को भी लील जाएगी.फ़िल्म का नैरेटिव कुछ इस तरह से खींचा गया है कि सूखे और गर्मी की तपिश आपको सिनेमा की कुर्सी में भी असहज कर देगी.

बैंक लोन को न चुकाने का रास्ता ढूंढते ग्रामीण, कर्ज के दबाव में आत्महत्या करते किसान, कर्ज वसूली में लगे बैंक कर्मी की मजबूरी और दुनियादारी और इधर उधर की बातों में हाशिए पर जाता पर्यावरण, मेरी सहयोगी की भाषा में यह फ़िल्म आपको एक तमाचा जड़ जाती है और आपको बता देती है कि जिंदगी में पर्यावरण क्या क्या बदल रहा है.

निर्देशन

इस फिल्म के निर्देशक और सह लेखक नीला माधव पंडा ‘आई एम कलाम’ और ‘जलपरी – दि डेज़र्ट मरमेड’ जैसी फ़िल्में बना चुके हैं और इस फ़िल्म को देखकर एहसास होता है कि भारत में पर्यावरण पर उनसे अच्छी फ़िल्म बनाना अभी किसी और निर्देशक के बस में नहीं है.

हां गिरीश मलिक की राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘जल’ के विज़ुअल इफेक्ट्स इस फिल्म से कई गुना बेहतर रहे, पर यही खासियत है ‘कड़वी हवा’ कि नीला यहां परेशानी दिखाने के लिए विज़ुअल इफेक्ट्स नहीं डालते. वो दिखाते हैं कि कैसे असल दुनिया ही तकलीफ़देह होती जा रही है.

फ़िल्म थोड़ी धीमी है और नीला ने बहुत कुछ दर्शकों की समझ पर छोड़ दिया है जैसे फ़िल्म में संजय मिश्रा के बेटे मुकुंद के साथ क्या होता है ये अनुमान आपके हिस्से में है.

अभिनय

रणवीर शौरी और संजय मिश्रा दो दिग्गज अभिनेता हैं और इनका साथ देने के लिए फ़िल्म में तिलोत्तमा शोम हैं. सूखाग्रस्त गाँव में मौजूद इन किरदारों को ये तीनों बखूबी निभाते हैं.

एक वसूली अधिकारी जिसे यमदूत के नाम से जाना जाता है. कैसे खुद एक कुचक्र में फ़ंसा है रणवीर उस किरदार के अलग-अलग रंगो को निभा ले जाते हैं.

एक ग्रामीण महिला के किरदार में तिलोत्तमा शोम प्रभावित करती हैं. पहली नज़र में आपको उनके किरदार में कुछ खास नहीं लगेगा लेकिन इस किरदार की डिटेलिंग ही समझा देती है कि उन्होंने कितने ध्यान से अपना रोल निभाया है.

हैरान करता है जब वो दक्षता से चूल्हे को जला बुझा देती हैं, पानी देने का तरीका, पैसे को खोंसना- वो एक विलक्षण अभिनेता हैं पता चल जाता है.

संजय मिश्रा को सबसे ज्यादा स्क्रीनटाइम मिला है और वो क्यों दिया गया है इस फ़िल्म को देखकर आपको समझ आ जाएगा.

कुल मिलाकर

फ़िल्म के अंत में गुलज़ार साहब की एक नज्म है जो इस फ़िल्म की हाइप्वाइंट है. ये फ़िल्म मसाला फ़िल्म नहीं है. सिर्फ कमाई और ग्लैमर के लिए कोई ग्रामीण नौटंकी नाच गाना इस फिल्म में नही डाला गया है.

फ़िल्म शुरू से अंत तक एक गंभीर विषय पर बात करती है और गंभीर बनी रहती है. नीला ने एक काम जो अच्छा किया है वो यह कि वो इसे जबरन मनोरंजक बनाने कि कोशिश नहीं करते हैं.

बाहर निकलते समय वो कहते हैं, मैं यही चाहता था कि आप बाहर आएं तो कुछ असहज होकर आएं, मेरी फ़िल्म का मकसद मैसेज है, एंटरटेनमेंट के लिए तो सब फिल्म बना ही रहे हैं.

संजय मिश्रा जो इस फ़िल्म के मुख्य किरदार है जानते हैं कि इस फिल्म में कड़वाहट है, वो बस इतना कहते हैं कि कभी कभी कड़वाहट भी ज़रूरी हो जाती है, ताकि दूसरे स्वाद की महत्ता बनी रहे, पर्यावरण को हमारी ज़रूरत है और इसे ओर हमें देखना ही चाहिए.

ये आपकी रेगुलर वीकेंड वाॅच फ़िल्म नहीं है और यकीन मानिये कि यह फ़िल्म आपको असहज कर ही देगी, इसलिए अगर आप एक फैमिली एंटरटेनर ढूंढ रहे हैं तो यह आपकी मूवी नहीं लेकिन आप कुछ अलग देखना चाहते हैं तो हां थोडी कड़वाहट भी ज़रूरी है.

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