FILM REVIEW: ‘लखनऊ सेंट्रल’ के रॉकस्टार हैं फरहान और उनकी मंडली

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जानिए कैसी है फरहान अख्तर की फिल्म लखनऊ सेंट्रल

लखनऊ सेंट्रल में सुरों का तड़का लगाते हैं फरहान अख्तर

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    November 7, 2017, 4:11 PM IST

‘लखनऊ सेंट्रल’ फिल्म के प्रोमो देखने के बाद दर्शक जरूर ये सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या है? हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हाल ही में ‘कैदी बैंड’ नाम से एक फिल्म रिलीज हुई थी. इसमें भी जेल में बंद कैदियों के बैंड की कहानी थी.

लेकिन ‘कैदी बैंड’ देखकर ‘लखनऊ सेंट्रल’ को जज करना ज्यादती होगी. क्योंकि फिल्म ‘लखनऊ सेंट्रल’ अपनी पकड़ बनाए रखती है. साथ ही कुछ इमोशनल पल भी दे जाती है.

कहानी की शुरुआत जानी पहचानी है. मुरादाबाद का एक लड़का है जो सिंगर बनना चाहता है. किशन (फरहान) का सोचना है कि शहर छोटे होते हैं, सपने नहीं. वह अपना सपना पूरा करने के लिए दिल्ली जाने वाला है. लेकिन इससे पहले कि ये सपने सच हों, कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं कि किशन पर एक आईएएस के मर्डर का इल्जाम लग जाता है.

कई अपीलों के बाद भी किशन को इंसाफ नहीं मिलता और फांसी की सजा हो जाती है. अब तक सब कुछ नॉर्मल हिंदी फिल्मों की तरह चल रहा था. लेकिन लखनऊ सेंट्रल में कैद होने के बाद जब उत्तर प्रदेश के सीएम के रोल में रवि किशन कैदी बैंड कॉम्पिटीशन का आदेश करते हैं तो इसमें फरहान को अपने जेल से भागने का एक रास्ता दिखता है.इसके बाद शुरू होती है ‘लखनऊ सेंट्रल’ की असली कहानी. भागने की प्लानिंग के बीच संगीत सीखने का नाटक गजब का है. पुलिस को शक ना हो इसलिए प्रैक्टिस चालू है.

जरूरत से ज्यादा रौब वाले जेलर रौनित रॉय की नाक के नीचे जेल से भागने का प्लान बनाना और कामयाब होकर भी पीछे हटने की वजह फिल्म को खूबसूरत बनाती है.

फिल्म का फर्स्ट हाफ भले ही बोरिंग लगे, लेकिन सेंकड हाफ हंसाता भी है और एक इमोशन भी देता है. हां ये थोड़ा लंबा खींचा हुआ भी लगता है. लेकिन आखिर में बैंड की परफॉर्मेंस और दोस्ती के नाम इतना तो बनता है. कई डायलॉग्स दिल छूते हैं. ‘कुंए का मेंढक अगर नाले में छिपे तो इसे आजादी कहेंगे’ जैसे डायलॉग सटीक लगते हैं.

परफॉर्मेंस की बात करें तो सभी सितारों ने बेहतरीन काम किया है. ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में लेक्चर के नाम पर दिल के दौरे का नाटक करने वाले पप्पी भैया इस फिल्म में इंजीनियर बने हैं. गिप्पी ग्रेवाल ने इंप्रेसिव काम किया है. सीएम साहब बने रवि किशन अपने रोल में जच रहे हैं.

अगर स्टार देने की बात हो तो कहानी के लिए आधा स्टार, परफॉर्मेंस के लिए एक स्टार, डायरेक्शन के लिए एक स्टार देना कहीं भी गलत नहीं होगा.

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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
स्क्रिनप्ल:
डायरेक्शन:
संगीत:





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