Godzilla- King of the Monsters Movie Review: इस पर वक़्त बर्बाद ना ही किया जाए तो बेहतर

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फिल्म रिव्यू: गॉडज़िला-किंग ऑफ़ द मॉन्स्टर्स

विज़ुअल इफेक्ट्स ठीक ठाक हैं लेकिन बीते दिनों VFX का स्तर इतना बेहतर हो चुका है कि गॉडज़िला के कारनामे किसी कॉमिक्स का हिस्सा लगते हैं.

मॉन्स्टर फिल्मों का भी अपना ही मज़ा है. जहां एक तरफ विशालकाय जीव, दुनिया तबाह करने में जुटे होते हैं वहीँ उनके ही जैसा कोई उनसे लोहा ले रहा होता है. फिर कुछ वैज्ञानिक भी होते हैं जिनका कोई एक्सपेरिमेंट फेल हो जाता है और उनके सामने सब कुछ बर्बाद हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है. जैसे सुपरहीरो, फिल्मों के कुछ स्टीरिओटाईप्स होते हैं वैसे ही मॉन्स्टर फिल्मों के भी कुछ बेसिक रूल्स होते हैं.

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गॉडज़िला-किंग ऑफ़ द मॉन्स्टर्स इन सारे नियमों का ध्यान रखने की कोशिश करता है और इस चक्कर में कुछ भी नया नहीं करता है. नतीजा है एक बहुत ही सामान्य फिल्म जिसमें शुरुआती तीस मिनट्स में आप मूल मुद्दे तक आ ही नहीं पाते. मुख्य किरदार बिलकुल डरे हुए नहीं लगते और ना ही उनमें किसी तरह का उत्साह दिखता है. गॉडज़िला की पहली हुंकार थोड़ा आनंद ज़रूर देती है लेकिन थोड़ी देर बाद सब कुछ वापस सिर्फ शोर में तब्दील हो जाता है.

विज़ुअल इफेक्ट्स ठीक ठाक हैं लेकिन बीते दिनों VFX का स्तर इतना बेहतर हो चुका है कि गॉडज़िला के कारनामे किसी कॉमिक्स का हिस्सा लगते हैं. वेरा फारमेगा और मिली बॉबी ब्राउन जैसे कलाकार भी स्ट्रगल करते नज़र आते हैं. असल में निर्देशक रोबर्ट डोहर्टी का सारा फोकस परदे पर ‘स्पेक्टेकल’ अवतरित करने में जाता है और खामियाज़ा फिल्म को भुगतना पड़ता है. मुझे संदेह है की यह फिल्म नए ज़माने के बच्चों को भी इम्प्रेस करने में कामयाब हो पाएगी. इस पर वक़्त बर्बाद ना ही किया जाए तो बेहतर.

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