National Doctors Day 2021: जानें कौन थीं भारत की पहली महिला डॉक्टर, ये है उनकी कहानी

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National Doctors Day 2021: हर साल 1 जुलाई को राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस मनाया जाता है. यह दिन डॉक्टर्स के योगदान को समर्पित होता है और इस दिन आम जनता को डॉक्टर्स के महत्व के बारे में जानकारी दी जाती है. डॉक्टर्स को हमेशा से भगवान का दर्जा दिया जाता रहा है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वो हमेशा अपने वक्त और जान की परवाह किए बगैर अपने मरीजों की जान बचाने की जी-तोड़ कोशिश करते हैं. कोरोना काल में डॉक्टर्स ने जिस मुस्तैदी के साथ कोरोना वारियर्स की भूमिका निभायी है

आइए इस मौके पर देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदी गोपाल जोशी के बारे में बात करते हैं. वह तब देश में डॉक्टर बनकर विदेश से लौटी थीं, जब देश में महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई नहीं होती थी. इसमें बहुत रोक-टोक होती थी. इस पहली महिला डॉक्टर का नाम आनंदी गोपाल जोशी था, जिनके जीवन की कहानी दिल को छू लेने वाली है. आपको बता दें कि आनंदी की शादी 9 साल की उम्र में करा दी गई थी. उनका घर बहुत रूढ़िवादी था. शादी के बाद उनका नाम आनंदी गोपाल जोशी पड़ा. आइए जानते हैं डॉक्टर्स डे पर उनके डॉक्टर बनने की उनकी कहानी…

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पुणे में ब्राह्मण परिवार में जन्मी आनंदीबाई जोशी की शादी 9 साल की उम्र में करीब 25 साल के गोपालराव जोशी से हुई थी. आनंदी जोशी की जीवनी संवाद प्रकाशन ने प्रकाशित की है जिसमें उनके जीवन संघर्ष और समाज की रूढ़ियों को तोड़ते हुए आगे बढ़ने की कहानी है. उनकी जीवनी के अनुसार गोपालराव की आनंदी से शादी की शर्त ही यही थी कि वह पढ़ाई करेंगी. आनंदी के मायके वाले भी उनकी पढ़ाई के खिलाफ थे. शादी के वक्त आनंदी को अक्षर ज्ञान भी नहीं था. गोपाल ने उन्हें वर्णमाला तक सिखाया. नन्ही सी आनंदी को पढ़ाई से खास लगाव नहीं था. उनको लगता था कि जो औरत पढ़ती है उसका पति मर जाता है.

आनंदी को गोपाल डांट-डपट कर पढ़ाते थे. एक दफा उन्होंने आनंदी को डांटते हुए कहा था- तुम नहीं पढ़ोगी तो मैं अपना मज़हब बदलकर क्रिस्तानी बन जाऊंगा. अक्षर ज्ञान के बाद गोपाल, आनंदी के लिए अगली कक्षा की किताबें लाए. फिर वह कुछ दिन के लिए शहर से बाहर चले गए. जब वापस लौटे तो देखा कि आनंदी घर में खेल रही थी. वह गुस्से से बोले कि तुम पढ़ नहीं रही हो. आनंदी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, जितनी किताबें थी सब पढ़ चुकी.

जीवन में लगे एक बड़े झटके ने आनंदी को डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित किया. जब वह 14 साल की थीं, तब वह मां बनीं लेकिन केवल 10 दिनों में उन्होंने अपनी नवजात संतान को खो दिया. ये उनके लिए बड़ा आघात था. तब उन्‍होंने यह प्रण लिया कि वह एक दिन डॉक्‍टर बनकर दिखाएंगी और ऐसी असमय मौत को रोकने की कोशिश करेंगी. उनके पति ने उनका इस मामले में लगातार साथ दिया था. उस समय एक विवाहित महिला के लिए अमेरिका जाकर पढ़ाई करना बहुत मुश्किल था. समाज की आलोचनाओं और रूढ़ियों से विचलित हुए बगैर वह अमेरिका गईं और पढ़ाई की.

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आनंदीबाई ने कोलकाता से पानी के जहाज से न्यूयॉर्क तक की यात्रा की. उन्हें पेंसिल्वेनिया की वूमन मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा कार्यक्रम में भर्ती होने के लिए नामांकित किया गया, जो कि दुनिया में दूसरा महिला चिकित्सा कार्यक्रम था. आनंदीबाई ने साल 1886 में (19 साल की उम्र में) MD की डिग्री हासिल की थी. वह एमडी की डिग्री पाने वाली और पहली भारतीय महिला डॉक्‍टर बनीं. साल 1886 के अंत में, आनंदीबाई भारत लौट आईं, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ. कोल्हापुर की रियासत ने उन्हें स्थानीय अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल की महिला वार्ड की चिकित्सक प्रभारी नियुक्त किया था.

26 फरवरी 1887 को आनंदीबाई की 22 साल की उम्र में तपेदिक से मौत हो गई. साल 1888 में, अमेरिकी नारीवादी लेखक कैरोलिन वेल्स हीली डैल ने आनंदीबाई की जीवनी लिखी. डॉल आनंदीबाई से परिचित थीं. साल 2019 में, मराठी में उनके जीवन पर एक फिल्म आनंदी गोपाल नाम से भी बनाई गई.

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