Sardar Ka Grandson Review: इमोशंस से भरी इस फिल्म में थी वेब सीरीज बनने की काबिलियत

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Sardar Ka Grandson Review: कुछ कहानियां विस्तार से दिखाई जानी चाहिए. हर बात को पकने का मौका मिल जाता है. ऐसे ही कुछ कहानियां लिखी तो शायद वेब सीरीज के लिए जाती हैं मगर उन्हें फिल्म बना दिया जाता है. ऐसी एक कहानी है सरदार का ग्रैंडसन (Sardar Ka Grandson). नेटफ्लिक्स पर हाल ही में आयी है. कहानी में दिल है. बहुत बड़ा. बस दिमाग से थोड़ा समझौता करना पड़ता है. अर्जुन कपूर एक फ़िल्मी खानदान के चश्म-ए-चराग हैं और उनसे उम्मीद भी की जाती है कि वो अच्छा अभिनय करें. दुर्भाग्य ऐसा है कि विधिवत शिक्षा के अभाव में और अभावों के अभाव में दुःख की भावनाएं चेहरे पर उतनी संजीदगी से आ नहीं पाती. अर्जुन में प्रतिभा के अंश दिखाई देते हैं मगर कोई निर्देशक अभी तक उनसे अच्छा काम नहीं करवा सका है. सरदार का ग्रैंडसन की निर्देशिका हैं काशवी नायर. ये निर्देशक शशिलाल नायर (अंगार, एक छोटीसी लव स्टोरी) की सुपुत्री हैं. इसके पहले वो युद्धबंदियों पर 108 एपिसोड की एक वेब सीरीज बना चुकी हैं और संभवतः इसी वजह से उन्हें सरदार का ग्रैंडसन को इतने कम समय में समेटने में असुविधा हुई होगी. कहानी बहुत ही मज़ेदार है. लेखिका हैं अनुजा चौहान, जिनकी किताबों पर पहले फिल्में और टीवी सीरियल बन चुके हैं. अनुजा ने अपने करियर की शुरुआत एडवरटाइजिंग से की थी इसलिए इनकी लेखनी में छोटी छोटी बातें देखने को मिलती हैं, क्यूट ऑब्सेर्वशन्स और जिन्दगी से चुराए कुछ पल. कहानी है अमृतसर की सरदार कौर (नीना गुप्ता) की जो अपनी जिन्दगी के आखिरी दिनों को भी तरीके से पूरी मस्ती से जीना चाहती है. उनका एक सपना है कि लाहौर में वो अपने घर को देखना चाहती हैं जहां वो अपने पति के साथ रहा करती थी. अपने बड़े बेटे (कंवलजीत) और लॉस एंजेलिस में रहने वाले अपने पोते अमरीक (अर्जुन कपूर) से वो उम्मीद करती है कि ये दोनों उसकी आखिरी इच्छा पूरी करवा दें. अमरीक काम के मामले में लापरवाह शख्स है और इसलिए अपनी गर्लफ्रेंड राधा (रकुल प्रीत सिंह)से ब्रेकअप कर लेता है. अपनी दादी की इच्छापूर्ति करने में उसे कई दिक्कतें नज़र आती हैं. एक बार फिर वो फेल न हो जाये और अपनी दादी की आखरी इच्छा पूरी न कर पाए इस से बचने के लिए वो लाहौर जाता है, लेकिन वहां उसकी मुश्किलें आसान नहीं होती बल्कि बढ़ जाती हैं. क्या वो अपनी दादी की आखिरी इच्छा पूरी कर पाता है, बस यही कहानी है. इस कहानी की हर सिचुएशन बहुत मज़ेदार है, एक सिचुएशन सच होती दिखती है और आपको हंसी भी आती है लेकिन जहां कहानी या यूं कहें की स्क्रीनप्ले चूक जाता है वो है हर बाधा या हर सिचुएशन के पकने से पहले ही उसे ख़त्म कर दिया जाता है. अर्जुन कपूर काम को लेकर लापरवाह है, चलता है ऐटिटूड रखता है. जिस बात की वजह से उसका राधा से ब्रेक अप होता है वो सिचुएशन में भावनाएं बड़ी सतही ढंग से आती हैं. इसलिए न अर्जुन और न रकुल प्रीत, किसी के प्रति दर्शक के मन में कोई भावना ही नहीं जागती. अर्जुन का अपने पुश्तैनी धंधे से दूरी बनाये रखने की वजह इतनी सतही है कि उसके मन का दुःख समझ ही नहीं आता. अर्जुन जब ब्रेक अप के बाद राधा को मदद के लिए फ़ोन करता है तब भी उनके आपसी संवाद बहुत ही मामूली सुनाई देता हैं उनमें कोई गहराई नज़र नहीं आती. पाकिस्तानी वीसा अथॉरिटी हों या लाहौर की म्युनिसिपल अथॉरिटी बड़े ही मज़ाहिया से हैं. कॉमेडी फिल्म है लेकिन जहाँ कॉमेडी सिचुएशन से हो रही हो, इंसानों को संजीदा रखा जा सकता है. नीना गुप्ता एक क्रिकेट मैच देखते हुए पाकिस्तान एम्बेसी के आदमी की पिटाई कर देती है, ये बात हज़म ही नहीं होती.इस कहानी को छोटी-छोटी कहानियों में बांटना चाहिए था और फिर उस पर एक वेब सीरीज बनानी चाहिए थी. इतनी साफ़ सुथरी, क्यूट और बिना गाली गलौच के फिल्मायी गयी एक फॅमिली फिल्म क्यों न एक फॅमिली वेब सीरीज बन जाती. अगर आपको पंकज कपूर का ऑफिस ऑफिस याद हो तो उसमें हर ऑफिस में कस्टमर को होने वाली समस्याओं का एक बेहतरीन वर्णन किया गया है. सरदार का ग्रैंडसन उस लेवल तक जा सकती थी अगर सिर्फ फिल्म न होती. हर समस्या एक नए एपिसोड में बनायीं जा सकती थी और सरदार का फ्लैशबैक (जॉन अब्राहम और अदिति राव हैदरी) सीन जब वो लाहौर में थी, बीच बीच में इतिहास के पन्नों की तरह जोड़े जाते, उसकी चुप चुप के शराब पीने की आदत, अर्जुन के चचेरे भाई की कभी न ख़त्म होने वाली ईर्ष्या और ऐसे कई किस्से, बीच में डाले जा सकते थे. अर्जुन और रकुल प्रीत के रोमांस को थोड़ा और मौका मिलता, कुछ अच्छे गाने मिलते और सभी कलाकार और खुल के सामने आते. ग्रैंडसन ऑफ़ सरदार में नीना गुप्ता के अभिनय की तारीफ करने का कोई मतलब नहीं है. एक तो तजुर्बा ऊपर से ज़िन्दगी, दोनों ही बातों से कलाकार मँजता है. नीना एकदम चमकदार हैं. अर्जुन कपूर का दुर्भाग्य ही है कि उन्हें कोई ऐसा निर्देशक नहीं मिलता जो उनसे काम निकलवा सके. उनके पास अनुभव की कमी है, इसलिए उन्हें थोड़ा और घीसना चाहिए. उनके पास ज़िन्दगी का अनुभव भी बड़ा लिमिटेड है इसलिए उन्हें अभिनय सीखना चाहिए. प्रतिभा है, मगर इस्तेमाल करने से पहले की प्रक्रिया से काम वाक़िफ़ हैं. रंदा मारेंगे तो घिस के शानदार बनेंगे. रकुल प्रीत सिंह सुन्दर हैं और बस यही काम है उनका. जॉन अब्राहम को सरदार और अदिति राव हैदरी को पंजाबन क्यों कर बनाया गया है ये समझ के बाहर है. प्यार पनप ही रहा होता है कि देश का विभाजन आ जाता है. जॉन और अदिति थोड़े मिसफिट हैं. बाकी कलाकार अपने अपने रोल की पूर्ति करते नज़र आते हैं. कुमुद मिश्रा जो की लाहौर के मेयर बने हैं, छोटे से रोल में भी अपनी अभिनय क्षमता से सबको रिझा लेते हैं. फिल्म में कोई गैरज़रूरी बात नज़र नहीं आती सिवाय इसके की हर समस्या बड़ी आसानी से हल होती जाती है. इतना आसान होता अगर सब कुछ तो फिर क्या बात थी. दिलीप कुमार और राज कपूर के पुश्तैनी घरों पर पाकिस्तान सरकार का निर्णय भी उतना आसान नहीं है. ओवर सिम्प्लिफिकेशन है. संगीत तनिष्क बागची ने दिया है. गानों में एक भी ऐसा नहीं बना है जो चार्ट बस्टर बन सके. हालाँकि काफी स्कोप था गानों का भी और उनके पॉपुलर होने का भी. फिल्म में इमोशंस तो हैं लेकिन कहीं एक लेवल पर आ कर रुक जाते हैं. इस से पहले की किसी सीन में आपकी आँख भर आये, सीन ख़त्म हो जाता है. इस से पहले की आप रोमांस का मज़ा ले सकें, कहानी कुछ और हो जाती है. इस से पहले की आप कॉमेडी पर ठहाके मार सके, एक संजीदा सीन आ जाता है.
सरदार का ग्रैंडसन अच्छा प्रयास है. अपने दादा, दादी या घर के बुज़ुर्गों के साथ भी बैठ कर देख सकते हैं. यदि न देख सकें तो कम से कम उनसे बात कर के पता कर लें कि उनके मन में ऐसा कोई ख्याल या इच्छा तो नहीं है जो वो पूरी नहीं कर पा रहे हों. यदि है, तो आप पूरा करने की कोशिश करें. अच्छा लगेगा. नकारात्मकता के माहौल में किसी के मन का काम करना एक अच्छी और सकारात्मक पहल होगी.

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