Sherni Review: रूढ़िवादी पुरुषों की दुनिया में शेरनी बिना आवाज ही रह जाती है

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Sherni Review: विद्या बालन की अभिनय क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है. विजय राज, नीरज कबी, ब्रजेन्द्र काला, शरत सक्सेना यहां तक कि मुकुल चड्ढा की भी अभिनय क्षमता पर ऊंगली उठाने की कोई वजह नहीं है. निर्देशक अमित मसुरकर की फिल्म न्यूटन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है इसलिए उनके निर्देशन पर भी किसी को संदेह नहीं है. इन सब के बावजूद शेरनी की दहाड़ उतनी खूंखार नहीं लगती. रूढ़िवादी पुरुषों के बीच ये आवाज़ कहीं खो ही जाती है.

कुछ साल पहले ऐसे ही यवतमाल, महाराष्ट्र में एक आदमखोर शेरनी का किस्सा प्रचारित किया गया था. उस इलाके में कुल 13 लोग इस शेरनी का शिकार हो गए हैं ऐसा कहा गया था. फिर कोर्ट के ऑर्डर निकाले गए और एक प्राइवेट शिकारी को भी इसको पकड़ने के लिए दल में शामिल किया गया. पहले इरादा था कि ट्रैंक्वेलाइजर की मदद से अवनि या टी1 शेरनी को बेहोश किया जाएगा और उसे पकड़ कर दूर जंगल के अंदर छोड़ दिया जाएगा ताकि वो आदमियों पर हमला न कर सके. संदेहास्पद परिस्थितयों में एकदिन अवनि को मार गिराया गया और कोर्ट के ऑर्डर का हवाला दे कर केस रफा दफा कर दिया गया. अवनि के साथ उसे छोटे छोटे शावक भी थे, जिन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया.

शेरनी फिल्म की भी यही कहानी है, सिर्फ इसमें विद्या बालन का एंगल लाया गया है, फिल्म बनाने के उद्देश्य से. विद्या डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर विद्या विन्सेंट के किरदार में है जिनकी ताज़ा ताज़ा पोस्टिंग शेरों के इलाके में होती है. रूढ़िवादिता, राजनीती, जातिवाद, सीनियर अफसर-जूनियर अफसर, प्राइवेट नौकरी में बॉस से त्रस्त पति, संस्कारों का पालन करवाने के लिए बेचैन मां और सासु मां के कई सारे गड्ढों के बीच छलांग मार मार कर बचती हुई विद्या, जंगल से प्रेम तो करती है लेकिन नौकरी के हाथों बंधी भी है. उसके इलाके की जंगलों में एक शेरनी के अफवाह ज़ोर पकड़ लेती है. स्थानीय विधायक और उनका कॉन्ट्रैक्टर भतीजा खुलेआम भ्रष्टाचार कर रहे हैं और विद्या के सीनियर कुछ नहीं करते.

विद्या के मातहत भी उस से झूठ बोलते हैं और सरकारी नौकरी में आयी आराम तलबी का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करते रहते हैं. शेरनी और उसके शावकों को उस इलाके से निकाल कर जंगल में अंदर तक छोड़ आने की कवायद में विद्या का साथ देते हैं प्रोफेसर की भूमिका में विजय राज वहीं विद्या की राह में रोड़े अटकाने के लिए पुरुषों की पूरी फ़ौज खड़ी है, जिसमें शामिल है विधायक के मित्र और शिकारी शरत सक्सेना जो कि सीधे शिकार में यकीन रखते हैं.अमित मसुरकर प्रतिभावान हैं. इसके पहले इन्होने राजकुमार राव अभिनीत न्यूटन बनायीं थी जिसे भारत ने ऑस्कर एंट्री बना कर भेजा था. न्यूटन ने कई अवॉर्ड जीते. राज कुमार राव से ज़िन्दगी थोड़ी आगे बढ़ी तो विद्या बालन तक जा पहुंचे अमित. फिल्म न्यूटन जैसी ही है. जंगलों में शूट की गयी है. न्यूटन में छत्तीसगढ़ का नक्सली इलाका था तो शेरनी में मध्यप्रदेश के जंगल हैं. जो हाल और हश्र न्यूटन का हुआ था तकरीबन वही शेरनी का भी हुआ. लेकिन इस फिल्म में विद्या ने बिना चीखे चिल्लाये, बिना आवाज ऊंची किये, बिना किसी विरोध प्रतिरोध के अपनी आवाज सब तक पहुंचा दी.

अमित और यशस्वी मिश्रा ने डायलॉग लिखे हैं. कभी कभी चुभने लगते हैं. किरदारों की आपसी बातचीत इतनी नॉर्मल है कि ऐसा लगता नहीं है कि फिल्म देख रहे हैं. विद्या के किरदार में थोड़ा फ़िल्मीपन है बाकी किरदार तो आम ज़िन्दगी का हिस्सा नजर आते हैं यहां तक कि विद्या की सास के रोल में इला अरुण भी टिपिकल सास का किरदार निभाती हैं, लेकिन कहीं भी नकली या नाटकीय नजर नहीं आती.

विद्या बालन का अभिनय अच्छा है. सरकारी नौकरी करने वाली महिलाओं की स्थिति क्या होती है ये इस फिल्म में अच्छे से दिखाया गया है. किस तरह पुरुष सहकर्मी उन्हें कमतर आंकते हैं. एक जगह तो गांव वाले भी इस बात नाराज हैं कि शेरनी ने उनके गांव के आदमी को मार डाला लेकिन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने एक महिला को जांच के लिए भेज दिया. गांव की राजनीती में दोनों दलों के नेता जिस तरह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहते हैं और किस तरह विद्या उनके बीच अपनी छवि बनाने की कोशिश करती है, वो देखने लायक है. विद्या और नीरज कबी के बीच के क्लाइमेक्स के सीन में काफी तनाव नजर आता है और यहीं आ कर फिल्म की छवि टूट जाती है. एक आम हिंदी फिल्म की तरह विद्या, अपने अधिकारी पर डायलॉग मार देती हैं. यहाँ लेखक, निर्देशक और अभिनेत्री, तीनों ही परंपरा से हट कर काम नहीं कर पाए. इस सीन में काफी कुछ करने की गुंजाईश थी. विद्या बालन ने अच्छा अभिनय तो तो किया है मगर उनसे इस से बेहतर करने की उम्मीद की जाती है. ये उनके लिए बहुत आसान रहा होगा. इस फिल्म में किसी और अभिनेत्री को लेते तो शायद उसके लिए ये रोल कठिन होता, विद्या के लिए नहीं.

नीरज कबी विद्या के सीनियर बने हैं. एक सीन में वो अपने मातहतों और स्थानीय विधायक के साथ बैठ कर जंगल के गेस्ट हाउस में बरामदे में शराब पीते नज़र आते हैं. अलाव जलाया गया है और बातें चल रही हैं. ऐसे में विद्या के बॉस ब्रजेन्द्र काला गाना गाने लगते हैं और बाकी लोग नीरज को उठा कर नाचने की ज़िद करते हैं…इस छोटे से सीन में नीरज ने एक अफसर का किरदार उतार दिया है. आखिर में विधायक के प्रभाव से मजबूर हो कर वो भी हथियार डाल देते हैं और विद्या के हाथों बेइज़्ज़त होते हैं. ब्रजेन्द्र काला तो इस तरह के रोल्स में फिट हो चुके हैं. उन्हें अलग कुछ करने की ज़रुरत भी नहीं है. विजय राज का किरदार बहुत अच्छे से लिखा गया है. नपातुला बोलते हैं. और नपातुला करते हैं लेकिन पूरे दृश्य पर प्रभाव छोड़ कर जाते हैं. शरत सक्सेना का दम्भी किरदार बहुत अच्छा है. उन्होंने इस किरदार के साथ पूरा न्याय किया है. मुकुल चड्ढा और इला अरुण अपने छोटे रोल में फिट हैं.

व्यवस्था पर कटाक्ष और व्यंग्य कसती इस फिल्म को राकेश हरिदास ने अपने कैमरे से कैद किया है. कोई नयापन नहीं है लेकिन राकेश ने कैमरे को हर दृश्य में एक किरदार बना रखा है. कैमरा मूवमेंट बहुत अच्छा है, थोड़ा डाक्यूमेंट्री स्टाइल शॉट्स लेने की वजह से इस कहानी के मूल कथानक में जंगल की भावना साफ नज़र आने लगती है. फिल्म की एडिटर हैं दीपिका कालरा. अनुभवी हैं. इस फिल्म में उन्हें 10 मिनिट काटने की स्वतंत्रता होनी चाहिए थी. फिल्म थोड़ी लम्बी हो गयी है. दीपिका ने काम तो अच्छा किया ही है साथ ही उनकी एडिटिंग से फिल्म को एक नया किरदार नज़र आया है, समय का.

फिल्म में कहावतों को मिला कर बनाया गया गाना “बन्दर बांट”, विद्रोही कबि हुसैन हैदरी ने लिखा है और बंदिश प्रोजेक्ट ने इसकी धुन बनायीं है. फिल्म में गाने का समय थोड़ा चूक गया है लेकिन गाना बहुत ही माकूल है और फिल्म की थीम के साथ मेल खाता है. प्रमोशन के लिए अकासा और रफ़्तार का गाय गाना मैं शेरनी भी बनाया गया था. उस से फिल्म को कोई खास मदद नहीं मिली.

फिल्म अच्छी है. परिवार के साथ देख सकते हैं. किसी तरह की नारेबाजी नहीं है. वस्तुस्थिति का अध्ययन है. एनिमल राइट्स की कहानी नहीं है बल्कि शेरनी जैसे सुन्दर जानवर के माध्यम से विद्या के नौकरीपेशा जीवन की चुनौतियों की अनूठी व्याख्या की गयी है.

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